अंबेडकरनगर। किसान के लिए कर्ज केवल बैंक की देनदारी नहीं है। फसल खराब होने, लागत बढ़ने और उपज का उचित दाम न मिलने पर यही कर्ज परिवार पर अतिरिक्त बोझ बन जाता है। ऐसे में ऋण की वसूली जरूरी है, लेकिन किसानों के नाम सार्वजनिक कर उन पर सामाजिक दबाव बनाने की प्रक्रिया सवाल खड़े करती है।
जनपद में कुछ बैंकों के बाहर केसीसी के बकायेदार किसानों के नाम बड़े बकायेदार के रूप में प्रदर्शित किए जाने का मामला सामने आया है। इनमें अपेक्षाकृत छोटे कृषि ऋण लेने वाले किसान भी शामिल बताए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे नामों के बैनर सार्वजनिक स्थानों पर लगाने की योजना की बात भी सामने आई है। हालांकि, इस संबंध में बैंक स्तर से आधिकारिक स्थिति स्पष्ट किया जाना बाकी है।
फसल खराब हुई तो बढ़ा आर्थिक दबाव
किसानों की आय मौसम, बाजार और उत्पादन लागत से प्रभावित होती है। अतिवृष्टि, सूखा या असमय बारिश से फसल प्रभावित होने पर किसान के सामने ऋण चुकाने की चुनौती बढ़ जाती है। छोटे और सीमांत किसानों के पास आर्थिक संकट से उबरने के विकल्प भी सीमित होते हैं।
केसीसी जैसी संस्थागत ऋण व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को साहूकारों पर निर्भरता से बचाना है। ऐसे में विशेषज्ञों के अनुसार वसूली की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें बैंक का वित्तीय अधिकार बना रहे और किसान की सामाजिक गरिमा भी सुरक्षित रहे।
कृषि नीति में अब केवल उत्पादन बढ़ाने के बजाय किसान की आय, जोखिम, ऋण और बाजार तक पहुंच को भी केंद्र में रखने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। पीएम-किसान, फसल बीमा और अन्य योजनाओं का लाभ भी तभी प्रभावी माना जाएगा, जब संकट में फंसे किसान तक उनकी पहुंच सरल हो।









