अम्बेडकरनगर। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान, लखनऊ के तत्वावधान में बीएनकेबी पीजी कॉलेज, अकबरपुर में आयोजित ग्रीष्मकालीन कार्यशाला ‘बोधि-पथ’ का समापन सोमवार को हुआ। समापन कार्यक्रम में बुद्ध दर्शन और पर्यावरण विषय पर विचार प्रस्तुत किए गए और प्रशिक्षुओं को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ प्रो. कमलेश कुमार मिश्र ने दीप प्रज्वलन कर किया। उन्होंने बुद्ध दर्शन और पर्यावरण के संबंध पर विस्तार से चर्चा की।
बुद्ध दर्शन में प्रकृति और जीवन का गहरा संबंध
मुख्य अतिथि ने कहा कि बुद्ध का दर्शन प्रकृति को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानता है। मनुष्य, पशु, पेड़, नदी और वायु सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। किसी एक को नुकसान पहुंचने से पूरा संतुलन प्रभावित होता है।
उन्होंने कहा कि आज प्रदूषण, वनों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसका कारण लालच और अज्ञान है। बुद्ध की शिक्षाएं सादगी, संयम और करुणा पर आधारित हैं, जो पर्यावरण संरक्षण का मार्ग दिखाती हैं।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सादा जीवन अपनाएं और आवश्यकता से अधिक उपभोग से बचें। इससे प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
प्रतीत्यसमुत्पाद पर आधारित पर्यावरण दृष्टि
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सत्य प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि बुद्ध दर्शन में प्रतीत्यसमुत्पाद की अवधारणा बताती है कि सभी चीजें एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पर्यावरण भी इसी संतुलन का हिस्सा है, जिसे समझना आज समय की आवश्यकता है।
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समापन सत्र में कार्यशाला में शामिल सभी प्रशिक्षुओं को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। कार्यक्रम के दौरान संयोजक डॉ. शशांक मिश्र, सह-संयोजक अमित, प्राध्यापक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
कार्यशाला में बुद्ध दर्शन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा को समझाने और व्यवहार में लाने पर जोर दिया गया।









